Wednesday, December 12, 2012

हिसाब





कुछ घर देखे हैं जहाँ ,
प्यास हमेशा   प्यासी  ,
भूख हमेशा भूखी 
और तन पर पड़े कपड़े ,
अंतर्मन की नग्नता  उघाड़ते  हुए से लगते हैं ।

सब कुछ तो  है उन घरों में 
खूबसूरत ,
करीने से लगा हुआ,
चमकदार ,
बेशकीमती |
सुना है , कुछ चूल्हों से आग छीनकर ,
 और ऊपर वाले का दिया ज़मीर बेचकर, 
 इकठ्ठा किया  है  उन्होंने ये असला ।

हिसाब थोड़ा टेढ़ा है ,
......पता नहीं सौदा महँगा  पड़ा या सस्ता ।

Friday, December 7, 2012

वो साँझ,गुज़रे किसी जाड़े की


जब धान की पूलियों पर ठहरी धूप,
खिड़की पर पड़ी चिक से झाँककर
 विदा ले गयी थी  ।
जब जाड़े के आलसी सूरज ने,
 अपना बोरिया जल्दी समेटा था 
और मद्धिम अम्बर जुगनुओं का मैदान बना था ।

जब रात की चादर ने 
अपने दो छोरों के बीच ,
ठण्ड से सिकुड़े दिन को छुपा लिया था ।
जब कोहरा  हवा में,
बालूशाही पर चाशनी सा चिपक गया था 
या शायद  बर्फ का काँच चमकता हुआ ,
शहर भर का श्रृंगार कर रहा था  ।

जब अलाव गुनगुने गीत गुनगुना रहा था ,
और चिमनी धुएँ के बीच  मुस्कुरा रही थी 
जब जाड़ों  का हिसाब सलाईयाँ  लगा रही थीं 
और  तुम्हारी कविता प्रेम भरी ,
चाय के प्यालों से छलकती ,
गज़क के तिल सी महकती ,
धडकनों का सफ़र तय करती रही थी ,

री साँझ !  पता है आज तुझे छुआ तो, .
जाड़े की वो गुज़री  साँझ  फिर याद आयी  |

Tuesday, November 6, 2012

प्रकृति की अनूठी मुस्कान|



पिघल रहा था वो बादल,

निचोङ अपने हर अंश को
,
बरखा की निखरी सी बूंदों में|
ढल रहा था उसका अस्तित्व,

उनींदी सी कोमल कलियों का,


यौवन सँवारने में|

जी उठे थे सूखे पात,

सौन्धी हो गयी थी मिट्टी ,


बुझा अपनी प्यास भीगी बरसात में|

असीमित ,निर्बाध, गगन को,

जब फैला हथेली देख रही थी मैं ,


लदी थी वो बारिश की बूँदो से|
बून्दें जो थी जीवन बादल का,

बून्दें जो हैं जीवन अब सूखे पातों का,


बन्द हैं मेरी मुट्ठी में|

अब जब आसमान रंगा है,

इन्द्रधनुष के सप्तरंगों में,


वहीं ठगी सी खङी हूँ मैं,इस सोच में …

.
क्या है इनका अस्तित्व,


बादल, बूँद,सूखे पात , फूल का रंग,


झरने का यौवन ,या चातक पक्षी की प्यास……
…..या सिर्फ मौसम की करवट

…..या प्रकृति की अनूठी मुस्कान|