Friday, September 1, 2017

स्त्रीत्व का सृजन



कोमलांगी, गौरवर्णा , चंचल, मृदुला 
इन्हीं छदम उपमाओं से हुई तू पराजित
बूझ कर, जान कर विडम्बना को इस 
फिर भी करती रही सदियों स्वयं को शापित | 

न पायी स्व को तू जान,न पा सकी तू वो स्थान,
सौंदर्य अलंकारों को मान कर अपना मान ,
न देख सकी तू पौरुष दम्भ, न उसका विस्तृत अभिमान | 

उर्वशी बन कभी, मेनका बन कभी 
सदियों सदी देवलोक में तू सजती रही 
वाचालों की चौपड़ चालों में, 
कुटिल दाँवों में दाँव  लगती रही | 

सौंदर्य की परिभाषाएँ जब तू गढ़ ना पायी,
दर्पित राजकुमारों के कुटिल हास्य को पढ़ ना पायी 
अंग-भंग हुआ तेरा ही पर तू कुटिला,तू ही सूर्पनखा कहलाई,
और मर्यादा पुरषोत्तम की मर्यादा को तनिक आँच भी ना आयी | 


जब तू प्रकृति से ही सर्जनी है,
तो कर तू सर्जना,अपनी नयी पहचान की,
हाँ नहीं तू दासी, पर जान ले साथ ही 
नहीं है मान कोई बस नाम भर के "देवी" उपनाम में,


मत हो दिग्भ्रमित, 
गीतों- कविताओँ  के अलंकारों पर मोहित,
देवी के पद्मासन से उतर,
दासी के पायदान से उठ कर,
छोड़ अचला- अबला सी  बैसाखियाँ 
तू बन सूर्य की सारथी, 
कर प्राण- प्रतिष्ठा अब नए निर्माण की 
तब तू दम्भ भर स्त्री होने का 
क्योंकि सौंदर्य नहीं, सृजन है तेरे स्त्रीत्व की पहचान सही |