Saturday, February 23, 2019

वो गाँव मेरा
















भरम जुड़  गया इस शहर से
पर मन तो  अब भी उस  गाँव ही में है
ठिकाना बना लिया इस शहर में हमने
पर घर तो अब भी उस गाँव ही में है
माना मंज़िलें मिली इस शहर में,
पर रास्ते तो अब भी उस गाँव ही में है
पा गए ओहदे, जान गए सलीके ,
पर मासूमियत वो मेरी अब भी उस गाँव ही में है
मन बहलाने का साज़ो- सामान जोड़ लिया है खूब यहां
पर वो कागज़ की नाव मेरी अब भी उस गाँव ही में है
भीड़ का हिस्सा बन  गए इस शहर में हम
हैं जिसकी आँख का पानी वो अब भी उस गाँव ही में है
छाँव तलाशते रहे हम यहाँ - वहाँ,
राह ताकता बरगद वो मेरा अब भी उस गाँव ही में है

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