Thursday, October 18, 2012

सुनो पतझड़ ! तुम दार्शनिक से लगते हो |



अजीर्ण में जीवन का राग ,
जादुई रंगों के पात ,
खो कर पाने की बात  ,
सतरंगी सौंदर्य सर्वत्र ,
नयी फसल का उत्सव ,
जाड़े के आगमन का नाद 
आँगन  के अनूठे  अलाव,
जुड़ाव और फिर अलगाव, 
गिर कर उठने की सीख ,
क्षण-भंगुर माया से प्रीत ,
जीवन-मरण की रीत ,
 ना होने में होने का आभास ,
दुःख में सुख का वास ,
बसंत के फिर आने की आस ,

सुनो पतझड़ ! तुम दार्शनिक से लगते हो |

 तुम सूरज की भट्टी में तप,
गिर चुके पत्तों में कुरकुरे हो ,
कितना कुछ कहते, सुनते ,दिखाते ,सिखाते ...
..... दे जाते हो 


तुम्हारे आने में जाना निहित है ,
और उस जाने से,  आना निश्चित  है ,
तुम आरम्भ  हो ,
और तुम ही अंत हो 
या शायद तुम अनंत हो ....

Wednesday, July 4, 2012

प्रिय ! प्रेम पदावली हमारी

हरी मिर्च सी तीखी ,
शक्कर- पारे सी मीठी ,
आँखों से नींदों की चोरी सी ,
अनगिन रागों वाली लोरी सी ,
दूरदर्शन के चित्रहार सी ,
चिर नवल  उपहार सी ,
जाड़े के ज़ुकाम सी ,
कमर दर्द में बाम सी ,
सर्कस के उन्मत्त  मंचन सी ,
सरल मधुर जीवन-दर्शन सी,
डार्विन के सिद्धांत सी,
उन्मादी कभी शाँत सी ,
सुबह की चाय के उबाल सी ,
मधु -सरिता की सतत चाल सी ,
कुम्हार की साँची कृति सी ,
मेघों की सरल अभिव्यक्ति सी ,
वर्षा की रिमझिम फुहार सी ,
 अनुपम अमूल्य अधिकार सी,


ओ प्रिय ! 

ये प्रेम पदावली हमारी कभी मूक -शब्दों के द्वन्द सी   ,कभी कविता के  मुक्त छंद सी ....
                         मिलकर लिखते रहें हम .. सदा -सदा |
      
            .... थोड़ी खट्टी  ज़्यादा   मीठी चाशनी की छठी वर्षगाँठ पर   
               ....   ये चाशनी घुलती रहे सदा-सदा

Sunday, May 13, 2012

मेरी माँ


नये ज़माने के रंग में,
पुरानी सी लगती है जो|
आगे बढने वालों के बीच,
पिछङी सी लगती है जो|
गिर जाने पर मेरे,
दर्द से सिहर जाती है जो|
चश्मे के पीछे ,आँखें गढाए,
हर चेहरे में मुझे निहारती है जो|
खिङकी के पीछे ,टकटकी लगाए,
मेरा इन्तजार करती है जो|
सुई में धागा डालने के लिये,
हर बार मेरी मनुहार करती है जो|
तवे से उतरे हुए ,गरम फुल्कों में,
जाने कितना स्वाद भर देती है जो|
मुझे परदेस भेज ,अब याद करके,
कभी-कभी पलकें भिगा लेती है जो|
मेरी खुशियों का लवण,मेरे जीवन का सार,
मेरी मुस्कुराहटों की मिठास,मेरी आशाओं का आधार,
मेरी माँ, हाँ मेरी माँ ही तो है वो
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