के एक आसमान है, पहुँच जाती हूँ जहाँ मैं, आंखें जो बंद कर लूँ तो
ख़्वाब जहाँ जुड़ जुड़ कर, चढ़ते हैं पायदान अब भी
तसव्वुर में घर है मेरा वहाँ एक, हर कमरा जिसका
सजा है उन सारे साज़ों- सामान से, जो हो सकती थी कभी हक़ीक़त भी
पर लौट-लौट आती हूँ तुम्हारे पास,
के खुली आँखों वाली हक़ीक़त, दिल के ज़्यादा करीब जो है
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