आग़ाज़ ख़्वाबों का हुआ बहुत से
पँख फड़फड़ाये उड़ने को पहली बार
विदा करती गीली आँखें देर तक
दुआ में हाथ उठाती रही बार-बार
ख़्वाबीदा से उस मक़ाम को पा गए
पर उम्मीदें हम से मुसलसल बनी रहीं
संग-तराशी खुद की इस इंतहा तक की हमने
कि मुस्कान इस बुत की अब हमसे मिलती नहीं
सोने लगे हैं अब हम ज़रा ज़्यादा
के खुली हो आँखें तो मिलते नहीं अब तुम
जो बंद कर लूँ, तो ख़्वाबों में बस तुम्हारा ही रैन-बसेरा