Tuesday, June 3, 2025

दुआ

 आग़ाज़ ख़्वाबों का हुआ बहुत से 

पँख फड़फड़ाये उड़ने को पहली बार 

विदा करती गीली आँखें देर तक

दुआ में हाथ उठाती  रही बार-बार 

मक़ाम

ख़्वाबीदा से उस मक़ाम को पा गए 

पर उम्मीदें हम से मुसलसल बनी रहीं 

संग-तराशी खुद की इस इंतहा तक की हमने 

कि मुस्कान इस बुत की अब हमसे मिलती नहीं 

ख़्वाब

सोने लगे हैं अब हम ज़रा ज़्यादा 

के खुली हो आँखें तो मिलते नहीं अब तुम 

जो बंद कर लूँ, तो ख़्वाबों में बस तुम्हारा ही रैन-बसेरा