गर शीश उठा तुम चल सकते हो
जब माने दोषी प्रियजन भी
गर विश्वास स्वयं पर कर सकते हो
जब छाया हो चहुँ ओर गहन अँधेरा ही
गर हो संयम करने का प्रतीक्षा भोर की
गर हो सम्बल लड़ने का गहन तिमिर से,
गर हो इच्छा द्वेष को, प्रेम के आलिंगन में भरने की
गर शब्दों से नहीं, कर्मों से ला पाओ तुम परिवर्तन
गर देख सकते हो तुम स्वप्न निर्माण के,
गर रख सकते हो जय- पराजय को तुला के बराबर पलड़ों पर
गर सत्य बदलता नहीं तुम्हारा दिशा बदलने पर हवा की
गर है शुचिता भूल स्वीकारने की तुममें ,
गर है साधुता भूल सुधारने की तुममें ,
गर हो तत्पर गिरते को उठाने के लिए
गर सफलता करे नमन तुम्हारा, पर तुम रहो नतमस्तक ही
तब सही अर्थों में सफल तुम हो पाओगे
तब सही अर्थों में पुत्र, तुम पुरुष कहलाओगे
एक गरम अदरक वाली चाय ,माँ के बने दस्ताने में थमी हुई खिड़की से झाँकता, मुस्कुराता ढीठ सा ठूँठ,रुई के फ़ाहों से हारा, कातर नींबूई सूरजदिसंबर की सुबहें, अलार्म से चौंककर ऐसे ही धीमे से शुरू होती हैं पर फिर ओवरकोट पहन निकल पड़ती हैं,अदरक वाली चाय को दस्तानों में थामे ही,सूरज की हिम्मत बढ़ाने,रुई के फाहों को हराने औरमुस्कुराते ठूँठ को कहने कि
जानी! तुम ऐसे भी बहुत क्यूट लगते हो
क्यों ज़ाया करें खुद को, सोच के ये
के ख़रे उतरते हैं क्या हम पैमानों पे किसीके
खुदगर्ज़ी के लगें हैं इल्ज़ाम हम पर कई,
की खुद को बदलने की अदा आती हमें नहीं
क्यों कहें अफ़साने बस किसी और की पसंद के,
के बातें बहुत हैं हँस देते हैं जिन पर हम भी
नामंज़ूर है, मंज़ूरी हर बात पर हो किसी और की,
के बेहद पसंद आती है पसंद हमें अपनी भी
यों तो बस नज़रों में किसी की हो जाए इज़ाफ़ा
तारीफें ऐसी पाने की चाह, हम रखते नहीं
पर हुए हैं अब आसमान, थे जिनकी नज़र में कभी हम ज़मीं,
जबसे अपने हुनर की, खुद हमें हुई है पहचान सही
क्यों करते रहे इंतज़ार किसी का
मसरूफ़ियत कम तो नहीं हमारे पास भी
जो छोड़ी है आदत ये पुरानी,
तो ही बन सके हैं हम, मसरूफ़ियतों का इंतज़ार
मायूस करती नहीं मुझे मेरी ख़ामियाँ
के सलीका लायी हैं ज़िंदगी जीने का यही
ज़िंदगी में किया है खुशी को हमने कुछ यूँ शुमार,
के अपनी खूबियों से ज्यादा खामियों को किया है प्यार