Friday, December 27, 2019

सुबह दिसंबर की



एक गरम अदरक वाली चाय ,
माँ के बने दस्ताने में थमी हुई 
खिड़की से झाँकता, मुस्कुराता ढीठ सा ठूँठ,
रुई के फ़ाहों से हारा, कातर नींबूई सूरज
दिसंबर की सुबहें, अलार्म से चौंककर 
ऐसे ही धीमे से शुरू होती हैं 

पर फिर ओवरकोट पहन निकल पड़ती हैं,
अदरक वाली चाय को दस्तानों में थामे ही,
सूरज की हिम्मत बढ़ाने,
रुई के फाहों को हराने और
मुस्कुराते ठूँठ को कहने कि 
 जानी! तुम ऐसे भी बहुत क्यूट लगते हो 


Thursday, November 14, 2019

ख़ुदग़र्ज़ी ही सही


क्यों ज़ाया करें खुद को, सोच के ये 
के ख़रे उतरते हैं क्या हम पैमानों पे किसीके  
खुदगर्ज़ी के लगें हैं इल्ज़ाम हम पर कई,
की खुद को बदलने की अदा आती हमें नहीं 

क्यों कहें अफ़साने बस किसी और की पसंद के,
के बातें बहुत हैं हँस देते हैं जिन पर हम भी 
नामंज़ूर है, मंज़ूरी हर बात पर हो किसी और की,
के बेहद पसंद आती है पसंद हमें अपनी भी

यों तो बस नज़रों में किसी की हो जाए इज़ाफ़ा 
तारीफें ऐसी पाने की चाह, हम रखते नहीं
पर हुए हैं अब आसमान, थे जिनकी नज़र में कभी हम ज़मीं, 
जबसे अपने हुनर की, खुद हमें  हुई है पहचान सही 

क्यों करते रहे इंतज़ार किसी का 
मसरूफ़ियत कम तो नहीं हमारे पास भी
जो छोड़ी है आदत ये पुरानी,
तो ही बन सके हैं हम, मसरूफ़ियतों का इंतज़ार 

मायूस करती नहीं मुझे मेरी ख़ामियाँ 
के सलीका लायी हैं ज़िंदगी जीने का यही 
ज़िंदगी में किया है खुशी को हमने कुछ यूँ शुमार, 
के अपनी  खूबियों से ज्यादा खामियों को किया है प्यार

Saturday, July 6, 2019

पॉलिश हुए जूते



स्कूल के जूतों पर 
ब्रश लोक गीत की थाप बजाती
दायें से बाएं, फिर घूम कर बाएँ  से दाएं 
आती जाती परेड लगाती 
चेरी ब्लॉसम की महक 
कुछ छोड़ आती और कुछ समेट लाती,

उफ़! ये जूते झक्क सफ़ेद मोजों पर चढ़े,
कुछ अड़े- अड़े से, कुछ बड़े बड़े से,
टकटकाते से हर आते-जाते को आईना दिखलाते 
इतराते कदम बढ़ाते और आगे बढ़ते  जाते 

फुटबाल को ललचायी आँखों से निहारते,
आज नहीं कल इतवार का ढाँढस बँधाते,
उफ़! ये जूते सफ़ेद मोजों पर ही 
चढ़ी धूल को रगड़ कर, खोई चमक लौटा लाते 
दाएँ, बाएँ, आगे बढ़ने, पीछे छोड़ने की जुगत लगाते 
के ये पॉलिश हुए जूते, किस्सागो के किस्सों से 
बचपन की धूप बुला लाते और इतराते, टकटकाते जाते