Sunday, April 7, 2019

प्रेम!


प्रेम!
मैं मानती हूँ, कि मैं तुम्हें तबसे जानती हूँ 
जब मुझे ऋतुओं का अंतर समझ आया था,
जब मुझे समझ आया था कि 
बसंत आना, प्रेम की प्रत्यक्ष पुनरावृत्ति है| 
परोक्ष में तो प्रेम कह रहा था निरंतर अपनी कहानी,
पतझड़ में भी, पतझड़ के बाद भी,
जब बहा ले गयी थी ठंडी, तीखी बयार 
स्वप्न-पत्रों को, रंगों को, 
मुझे तब तुम कठोर लगे थे, और तुम्हारे होने पर संशय था,
पर तुम वहीं थे, नयी कोंपलों के लिए ऊर्जा संजोते हुए 
नए फूलों के लिए रंग चुनते हुए, 
सर्द मौसमों में अपनी बड़ी- बड़ी हथेलियों में,
स्वप्न संजोते हुए |

प्रेम!
तुम्हारे बसन्ती रंग बहुत पक्के हैं इस बार | 

प्रेम!
सावन में मल्हार जब गाया जाए ,
तुम  हो सके तो खूब बरसना इस बार| 
 

Friday, March 22, 2019

प्रेम- संगीत


उस रोज़ जब पहली बार मिले थे तुम ,
बाग़ ही में से एक गुड़हल तोड़कर दिया था तुमने  मुझे ,
घुँघरुओं वाली बंधेज की चूनर पहने ,
मैं इतरा के चल दी थी,
तुम रुक रुक के, झुक-झुक के ,
जाने क्या ढूँढा करते थे 
और मैं तुमको हैरानी से,
मुड़ -मुड़ के देखा करती थी | 
हाँ बोलूँ या ना बोलूँ,
असमंजस में इस पहेली को बूझा करती थी | 

आज सालगिरह पर तुमने,
बंधेज की चूनर से गिरे सारे घुंघरू 
रेशम की डोर में पिरो, पहना दिए हैं मुझे 
मैं तब असमंजस में थी,
अब प्रेम में हूँ ,
तुम तब भी प्रेम में थे, अब भी प्रेम में हो 
असमंजस की बिखरी पहेलियों को 
पिरो दिया है तुमने प्रेम की डोर से अपनी | 
रेशम की डोर में घुँघरू सुर और ताल मिलाते हैं अब 
जब मिल कर हम रुक-रुक के, झुक -झुक के 
और कभी मुड़ -मुड़ के हर बिखरी पहेली को बूझा करते हैं | 
पहेलियाँ जीवन संगीत से  सुर-ताल मिलाती चलती हैं 
और इस संगीत के प्रेम में तुम भी हो और मैं भी हूँ 

Saturday, February 23, 2019

वीर भूमि












लाल चूड़ियों से सजी कलाई, 
अंतिम विदा भी ना कह पाई ,

दूध पीता  नौ- निहाल बैठना सीखा तो ,
पिता के काँधे की सवारी मिल न पाई 

छड़ी टूटी, आँख धुँधली, पर हिम्मत न टूटी 
बूढ़े कन्धों को इस उम्र में भी बेफिक्री मिल न पाई

 लोरियाँ धमाकों के बीच सिसकती  रहीं 
राह ताक -ताक  सूनी ममता पथराई 

वीर की परिणिता बनी जो,
उस वीराँगना का सिंगार अमिट 

शौर्य- पथ पर प्रशस्त करे जो पूत को, 
कोर में आंसू छुपाए उस माँ का साहस अद्वित  

सीना ताने सलामी दे जो तिरंगे में लिपटे लाल को ,
उस पिता का धीर देश की प्राचीर  चिन्हित 

ध्यान रहे अब ! 
व्यापार न कोई  कर पाए, शहीदों के बलिदान पर 
बिलख रहा बचपन जो, मिले उसे सम्मान हर , 
काश! बाँटने की राजनीति ख़त्म हो ये,
और जोड़ने की नयी रीत चलन में चल जाए 

पत्थरों और धमाकों का शोर खत्म हो वादियों में,
शिकारे चलें और गुलमोहर खिलखिलायें|
जय हिन्द इधर से बोलो तो उधर वादियोँ  से भी हिन्दोस्तान ज़िंदाबाद की आवाज़ आये