Tuesday, April 23, 2013

ख्वाहिशों वाली मशीन


ख्वाहिशों वाली मशीन
जाने कहाँ से बनवाता है ऊपरवाला,
कल-पुर्जे चुकते नहीं उसके,
और बैट्री चलती रहती है लगातार ,   
बिना रुके , बिना वियर एंड टियर के    
एक के बाद एक दागती है ये, 
नयी ख़्वाहिशें,और हर नयी को 
झोली में डाल, दौड़ती-फिरती है ज़िन्दगी ,

नापती हुई सुबह से शाम तक  का सफ़र |


और हम नींद में , जाग में,
घूमते हैं चकरघिन्नी से,
पीछॆ इन ख्वाहिशों के   ,
फिर पूरी हुयी ख्वाहिश को
 बुरी नजर से बचाने का नज़रबट्टू लगा,
 दौड़ते हैं नयी के पीछॆ |

वैसे तो ये जो ख्वाहिशों वाली मशीन है,

बिना ई. एम. आइ के आती है|
 पर हुँह ! कुछ चीज़ें मुफ्त आयें ,
तब भी महँगी ही पड़ती हैं |   
और ये तो कुछ ज्यादा ही महँगी पड़ी| 



     

Wednesday, December 12, 2012

हिसाब





कुछ घर देखे हैं जहाँ ,
प्यास हमेशा   प्यासी  ,
भूख हमेशा भूखी 
और तन पर पड़े कपड़े ,
अंतर्मन की नग्नता  उघाड़ते  हुए से लगते हैं ।

सब कुछ तो  है उन घरों में 
खूबसूरत ,
करीने से लगा हुआ,
चमकदार ,
बेशकीमती |
सुना है , कुछ चूल्हों से आग छीनकर ,
 और ऊपर वाले का दिया ज़मीर बेचकर, 
 इकठ्ठा किया  है  उन्होंने ये असला ।

हिसाब थोड़ा टेढ़ा है ,
......पता नहीं सौदा महँगा  पड़ा या सस्ता ।

Friday, December 7, 2012

वो साँझ,गुज़रे किसी जाड़े की


जब धान की पूलियों पर ठहरी धूप,
खिड़की पर पड़ी चिक से झाँककर
 विदा ले गयी थी  ।
जब जाड़े के आलसी सूरज ने,
 अपना बोरिया जल्दी समेटा था 
और मद्धिम अम्बर जुगनुओं का मैदान बना था ।

जब रात की चादर ने 
अपने दो छोरों के बीच ,
ठण्ड से सिकुड़े दिन को छुपा लिया था ।
जब कोहरा  हवा में,
बालूशाही पर चाशनी सा चिपक गया था 
या शायद  बर्फ का काँच चमकता हुआ ,
शहर भर का श्रृंगार कर रहा था  ।

जब अलाव गुनगुने गीत गुनगुना रहा था ,
और चिमनी धुएँ के बीच  मुस्कुरा रही थी 
जब जाड़ों  का हिसाब सलाईयाँ  लगा रही थीं 
और  तुम्हारी कविता प्रेम भरी ,
चाय के प्यालों से छलकती ,
गज़क के तिल सी महकती ,
धडकनों का सफ़र तय करती रही थी ,

री साँझ !  पता है आज तुझे छुआ तो, .
जाड़े की वो गुज़री  साँझ  फिर याद आयी  |