Thursday, May 19, 2011

चवन्नी नहीं रही !




छम से छम- छम छमकती चवन्नी,
चम से चम -चम चमकती चवन्नी ,
अम्मा के बटुए की जान चवन्नी ,
मिट्टी की गुल्लक की शान चवन्नी ,
छोटू का गुब्बारा लाती चवन्नी ,
गोले की टॉफी की मिठास चवन्नी,
इमली की खटास चवन्नी ,
यहाँ वहाँ घूमती घुमक्कड़ चवन्नी,
बन्दर- बंदरिया का खेल दिखाती चवन्नी,
अटरिया के मेले की सैर कराती चवन्नी
भैया के बल्ले से घुमकती चवन्नी ,
दीदी की आँखों का काजल बनती चवन्नी ,
मंदिर में चढ़ावा चढी चवन्नी ,
छुट्टे करवाने को सब्जी मण्डी में लड़ी चवन्नी ,
नुक्कड़ के भिखारी की झोली में गिरी चवन्नी ,
दुआओं का भण्डार चवन्नी ,
आवारा सी ना ठहरती चवन्नी

गोलू के गले में कितनी बार फँसी चवन्नी
बड़ी मुसीबत थी उससे ,
..अच्छा है नहीं रही ,
.....पर थी तो बड़ी गोल- मटोल ,
चमकती भी थी कभी- कभी ,
अचानक कैसे चली गयी,
.................. museum में दिखेगी क्या ?

Wednesday, November 24, 2010

बेचारा चाँद !


आँखों के नीचे काले घेरे लिए,
लो आज फिर उग गया है चाँद
कल रात की थकन उतरी नहीं,
देखो आज फिर काम पर लग गया है चाँद
उजले दिन पर स्याह दवात उलट,
...जब सूरज बेफिक्री की नींद सो गया,
रात को रोशन रखने को,
चाँदनी ओढ़े झूठ-मूठ मुस्कुरा रहा है चाँद
बिखरी मुहब्बत के टूटे टुकडो को
महखाने की राह दिखाए जा रहा है चाँद
जाने कितने ख़्वाबों का गवाह बना,सदियों से,
और टूटे ख्वाबों की चुभन जिये जा रहा है चाँद

Thursday, September 30, 2010


एक माँ के दो पूत,
एक पिता की वो संतान,
फिर क्यों एक हिन्दू कहलाया,
और एक मुसलमान

बरसों एक थाली से खाया,
बरसों एक गीत गुनगुनाया
बरसों एक आँगन में पले बढ़े,
जिसमें कभी गले मिले, कभी झगड़े

आज आँगन वो बँट गया,
अल्लाह-राम की राजनीति में फँस गया
एक पिता को नाम देकर दो ,
दो घरों में बिठाया क्यों ?
उनमें बैठा पिता अब रोये,
क्यों भाई पड़ोसी होए,
दोनों आँगन के कण-कण में वो,
फिर हाकिम सेBold पूछो
नाम देने की ज़रुरत क्यों ?