Tuesday, April 28, 2026

तसव्वुर

के एक आसमान है, पहुँच जाती हूँ जहाँ मैं, आंखें जो बंद कर लूँ तो 

ख़्वाब जहाँ जुड़ जुड़ कर, चढ़ते हैं पायदान अब भी

तसव्वुर में घर है मेरा वहाँ एक, हर कमरा जिसका

सजा है उन सारे साज़ों- सामान से, जो हो सकती थी कभी हक़ीक़त भी

पर लौट-लौट आती हूँ तुम्हारे पास, 

के खुली आँखों वाली हक़ीक़त, दिल के ज़्यादा करीब जो है

Wednesday, April 22, 2026

मेरी परछाई

मौन संगिनी 

निराकार, सर्व रूप साकरिणी 

चन्द्रकला सी चंचला 

श्रम सारिणी 

भोर जागृत उद्यमी 

सह पथ गामिनी 

मेरी पग बन्दिनी 

पर मेरी चिर-सखी 

कौन? मेरी परछाई 

रिहाई

बह जाने दो 

इन अश्कों को अब,

थक चुकी पलकों से 

इनकी रिहाई लाज़िमी है अब 

झूठी मुस्कान पहने चेहरे पर 

इनका नमक उधार है कब से 


Monday, March 16, 2026

मैं जोड़-घटाव हूँ

 के मैं जोड़-घटाव हूँ 

उन सब लम्हों का जो मुझसे होकर गुज़रे, मैंने देखे, सुने या सुनाए

उन सब बातों का जो कभी कही मैंने, या उनका जो नहीं कही मैंने 

उन किस्सों का जो मुझे सुनाये गए, मैंने सुने, या उन किस्सों का जो नहीं सुने 

 उन खुशबुओं का जो बस गयी मुझमें, या जो पीछे छूट गयी 

उन यादों का जो याद रही, या भूल गयी 

उन रिश्तों का जो बने रहे या बिखर गए 

उन दहलीज़ों, रास्तों, आँसुओं, उड़ानों, और मुस्कानों का जो मिलती रही डगर-डगर 

के मैं जोड़ घटाव हूँ उन मौसमों का,

उन बारिशों का जो मीलों का सफर तय कर पहुँची मुझ तक 

के मैं जोड़ घटाव हूँ उन अक्षरों का, जो शब्द बन गए मेरे लिए 

उन उम्मीदों का जो मैंने की, या की गयी मुझसे

के मैं जोड़-घटाव हूँ उन सब आशीषों का जो बने रहे साथ सदा  




Tuesday, June 3, 2025

हरसिंगार

 पेशानी पर सूरज सजा , 

देखो खिल गया हरसिंगार 

रंग-ओ-ख़ुशबुओं से इतराए 

मुस्कुराए तो हरदिल गुलज़ार 

मर्ज़

आसां इतना भी नहीं है इस मर्ज़ से शफा पाना 

ना ये वो मर्ज़ है जो बस इक बार होता है

ना ये वो नासमझी है जो समझदारों से नहीं होती 

ये जो मोहब्बत है ना बस हो जाती है 

दुआ

 आग़ाज़ ख़्वाबों का हुआ बहुत से 

पँख फड़फड़ाये उड़ने को पहली बार 

विदा करती गीली आँखें देर तक

दुआ में हाथ उठाती  रही बार-बार 

मक़ाम

ख़्वाबीदा से उस मक़ाम को पा गए 

पर उम्मीदें हम से मुसलसल बनी रहीं 

संग-तराशी खुद की इस इंतहा तक की हमने 

कि मुस्कान इस बुत की अब हमसे मिलती नहीं 

ख़्वाब

सोने लगे हैं अब हम ज़रा ज़्यादा 

के खुली हो आँखें तो मिलते नहीं अब तुम 

जो बंद कर लूँ, तो ख़्वाबों में बस तुम्हारा ही रैन-बसेरा 

कनखियों से देखना तुम्हारा

नज़र भर देखना तुम्हारा,

या उसी नज़र का ठहर जाना, 

कनखियों से देखना तुम्हारा , 

पल भर को नजरें मिलाना 

और चोरी पकड़ी गयी हो जैसे, ऐसे मुस्कुराना

बस श्रृंगार का मेरे इतना सा ठिकाना 

मुझसे सारी दुनिया तुम्हारी, तुमसे मेरा सारा ज़माना..

तेरी सूरत

एक दौर वो भी था ,

 जब खयालों का ठिकाना बस चेहरा तेरा ही था 

और इक दौर ये भी है के हज़ार कोशिश करने पर भी सूरत तेरी याद आती नहीं

ओ रे आम तू आम रहे

तू आम है, पर आम नही

हर मौसम की तू शाम नहीं 

कभी खट्टा, कभी मीठा सा,

पहले प्यार में लिखे गीत सा 

गालों पर तेरे ये जो शोख़ी है 

मिठास में तेरी, ये जो मदहोशी है 

तेरे केसरी कतरों से, तेरे नाज़ुक नखरों  से 

तेरे सिंदूरी हो जाने से 

तेरे मलीहाबाद और बनारस से चले आने से 

गर्मियों की सुबहें, गर्मियों की शामें यादगार हैं 

ओ रे आम तू आम रहे 

तेरे बाग़ तेरे बग़ीचे 

तेरी नस्लें तेरी फसलें गुलज़ार रहें 

के तू आम है 

पर आम नहीं 

और सुन भाई आम 

तू ख़ास रहे पर आम रहे! 

Monday, December 18, 2023

नेता जी इन चुनाव

 

टल टल जाते ज़मीनी मुद्दे

 मुद्दत बन बिन- बात 

फूँ फाँ से फ़ालतू फिरके 

फुँकारे पहन फन, कुर्सी की लगाए घात 

भरी सभा भारी-भरकम जुमले सुने ताली 

बीता चुनाव करे वायदे अब सब जुगाली 

कौन मसला फिसले, कौन मुद्दा उछले 

मेहनत से होती ऐसी ज़हीन- महीन  मुद्दाकारी

झक्क सफ़ेद कुरता, कभी पजामा, कभी धोती

नेता जी भैया, पहनें टोपी, पहनाये टोपी 


Saturday, December 2, 2023

दिसंबर की सुबहें

 




दिसंबर की सुबहें फ़ुरसत के गुज़रे लम्हों को याद कर 

ऐ काश की लम्बी साँस खींच दुबक जाती हैं एक बार फिर रजाई खींच कर 

ये मुआ अलार्म बार बार  बज बज कर याद दिलाता है 

वीकडे है आज 

सो जाना जी भर कर वीकेंड पर 

प्रॉमिस इस बार वीकेंड पर नहीं बजूँगा 

और रजाई गुनगुनी सी झप्पी दे, कानों में फुसफुसाती है कि दिसम्बर की सुबहों को नींद बड़ी मीठी आती है,

बजने दो मुए अलार्म को, इसका तो काम ही बजना है 

Tuesday, January 24, 2023

ज़िंदगी एक तमाशा

 



कोई दौड़ कहता है 

कोई खोज कहता है 

ज़िंदगी एक तमाशा है 

जो रोज़ होता है 


टूटी है तो जोड़ के रखो 

बिखरी है तो जमा के रखो

ज़िंदगी एक तमाशा है 

इसे सजा के रखो 


जो छूट गया पीछे 

उसकी याद बसा के रखो 

ज़िंदगी एक तमाशा है 

नए तमाशबीनों को मुस्कुरा के देखो 


जो पुराना हो चला 

उसको लीप- पोत कर चमकाते चलो 

ज़िंदगी एक तमाशा है 

इसमें चेहरे नए लगाते चलो 


कभी शहद मीठे, कभी नीम कड़वे

सुनो कभी, सुनाते कभी रहो 

ज़िंदगी एक तमाशा है 

जुबां खंजर को धार लगाते रहो 


आधे खाली पैमाने को 

आधा भरा ही कहो 

ज़िंदगी एक तमाशा है

जश्न इसका रोज़ मनाते रहो 


ना  कल में जीओ 

ना कल के लिए जीओ 

ज़िंदगी एक तमाशा है 

बाज़ी आज की आज लगाते रहो 


 निगाहों में उनकी जो ढूँढा करते थे 

"कैसी लग रही हूँ मैं" का जवाब 

चार आँखों वाले फ़ोन के सेल्फी कैमरे से 

अब उनका मुकाबला नहीं जनाब 

 


गुलाब जो हाले- दिल के गवाह होते थे 

मिलने पर दिल, बिछड़ने पर दवा होते थे 

और पुरानी किताबों में ठिकानेसार  

ख़त जो लौटा लाते  थे पहला प्यार 

"आई लव यू" वाला क्यूट इमोजी हैं अब बस 

और बेपरवाह, ग़ाफ़िल, समझदार उँगलियाँ  

 delete या Archive करते हुए उन्हें 

सोचा नहीं करती बार- बार 




रवायतें बदल रहीं हैं ज़माने की,
मिलने-जुलने, बुलाने, मनाने, बतियाने की 
नए तरीकें हैं नए ज़माने वालों  के,
मिलने, जुलने, बुलाने, मनाने बतियाने वालों के 

के वॉल पर मेरी आइयेगा साहब 
के हो सके लाइव हूँ जब तो कमेंट कर जाइएगा आप 
बस रील को मेरी दिल वाला लाइक कर दीजियेगा जनाब 
स्टोरी को मेरी हार्ट वाला बूस्ट करियेगा महाराज 

ज़ूम पर मिलकर वर्चुअल हैप्पी ऑवर करते हैं आज 
दो- चार जाम छलकाते हैं साथ 
कुछ सुनतें हैं, कुछ दिल की सुनाते हैं आज 
कार वाले बार के किस्सों पर हँसतें हैं बेहिसाब 

चलो इन मुएँ फोनों, लैपटॉपों का 
कुछ तो फायदा हुआ 
स्क्रीन के उस तरफ से मटर छीलती माँ बोली आज 
Happy Birthday बिटिया 
पिनटेरेस्ट से देखकर, बनाया है तेरा स्वेटर ख़ास 

Thursday, April 2, 2020

 खुद से मिलने के लिए महफ़िल सजाइये,
अब  तो भूले बिसरे इस  शहर में भी जाइये
कुछ सुने मन की, कुछ अपनी फरमाइये
दिल खोल के इस  बिछड़े दोस्त से अब बतियाइये
चाहे चुपचाप मुस्कुराइए, चाहे शर्माइये
आईने को ठेंगा दिखा, चाहे बाल बिखराइये
तारीख और दिन का हिसाब किताब भूल जाइये
सोमवार को शनिवार का थ्रो बैक बताइये
अधूरी पेंटिंग को पूरा करने के लिए ब्रश चलाइये
कुछ नया लिखने के लिए कलम उठाइये
फेड हुई पर उस ख़ास टी- शर्ट को पहन नोस्टालजिक हो जाइये
या फिर एकदम चमक कर और चमका कर
कैंडल लाइट डिनर का स्वांग रचाइये
बस  कुछ दिन तो
खुद से मिलने के लिए महफ़िल सजाइये
 लेकर मैं चलती हूँ शामें कितनी,
बिन  सीमा की रेखा  वाली
जोड़ती रहती हूँ अक्षर अक्षर
कहानियाँ कितनी उमंगों वाली